इन भीगी भीगी बूँदों में एक जानी पहचानी सी छुअन है,
इस भीगती माटी में वही पुरानी महक है,
और रह रह कर सर्द हवा का कोई झोंका, कानों में कुछ कह जाता है।
दूर क्षितिज पर जहाँ उमड़ती है यह काली बदली,
उस शून्य में ताकता बस सोच रहा हूँ
क्या आज तुम्हारे आँगन में भी नभ छाया है?