वह छाँव, जिसे मैने धूप से बचने को चुना था,
मेरे लिए उसका वजूद, बस मेरी तपिश का एक उधार था;
शाम ढली, तो वह अहसान मेरे लिए बेमानी हो गया।
मगर वह तरु-शिखर… जिसने बरसों निर्बाध धूप सही है,
आज फिर रात के सन्नाटे में, अपने ऊँचाई से झंकता हुआ मेरे बौने कद पर हंसता है।