वह पुरानी लकड़ी के गुमसाए हुए किवाड़ और उनके झरोखों की जिद्द से छनकर आती वह छिटकी हुई चाँदनी।

लोभ जागा मुझमें की वह मेरे ही कमरे में रहे, मगर किवाड़ बंद करते ही… कमरे से गायब थी वो।

और छोड़ गई थी अपने पीछे एक आदमकदम अंधेरा जो मेरे कानों में बुदबुदा रहा था “मूर्ख हो तुम”।