कल उतरा था कुछ मंशा के साथ इस मेढ़ में, मगर धीरे-धीरे कीचड़ इतना बढ़ चुका है, कि अब उससे बच कर कहीं आ जा सकना, मेरे बस का नहीं है। ​अब तो उसे झटकना भी मुमकिन नहीं। मैं पांव फटकता हूं, उस कीचड़ को झटकारने। मेरे हाथ लपकते हैं, उसे पकड़ने, जो मुझे उपहार में नहीं मिला, पर जो बस… सरक रहा है, शायद किसी आहट से। ​अब डर लगता है कि यदि यह कीचड़ सूख गया मुझ पर, क्या फिर भी तुम मुझे पहचान सकोगे?