निरावृत किये बगैर भला वीणा को,

किसने पाया यहाँ अप्राप्य ज्योत्स्ना को।

है रचना विरंचि की बड़ी विचित्र, निर्मोही,

यश का आसन दुर्लभ, अपयश क्षणिक आरोही।